जानिये निर्जला एकादशी का शुभ मुहूर्त और व्रत का खास महत्व।

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Nirjala Ekadashi

Nirjala Ekadashi

हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत ख़ास महत्व होता है। एक वर्ष में 24 एकादशी आती हैं जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष को आने वाली निर्जला एकादशी होती है। निर्जला एकादशी की सबसे अधिक मान्यता होती है | यह व्रत हिन्दू धर्म का सबसे कठिन व्रत माना जाता है। इस दिन, सभी भक्तगण अन्न जल ग्रहण किये बिना भगवान विष्णु की पूजा आराधना करते हैं। निर्जला एकादशी, पाण्डव एकादशी एवं भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

निर्जला एकादशी का शुभ मुहूर्त

2019 की निर्जला एकादशी 13 जून, गुरुवार की है, परंतु ये प्रारम्भ 12 जून बुधवार से होगी। इसका शुभ मुहुर्त 12 जून सुबह 6 बजकर 27 मिनट से शुरू होगा और 13 जून 4 बजकर 49 मिनट तक रहेगा। इसके साथ ही निर्जला एकादशी पारण का समय 14 जून 2019 को सुबह 5 बजकर 27 मिनट से शुरू हो कर, 8 बजकर 13 मिनट तक रहेगा।

निर्जला एकादसी पूजा की विधि

इस दिन सूर्यौदय से अगले सूर्यौदय तक अन्न और जल ग्रहण नहीं किया जाता। इस दिन, भगवान विष्णु की सच्चे मन से पूरे विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है, साथ ही ” ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ” मंत्र का मन में जाप किया जाता है। भगवान विष्णु की पूजा में उन्हें लाल फूलो की माला चढ़ाइये तथा धुप, दीप, फल अर्पित करके आरती करिये। द्वादशी को सूर्यौदय के बाद ही निर्जला व्रत खोल कर भोजन ग्रहण करें।

निर्जला एकादशी व्रत का प्रारम्भ

हिन्दू महाकाव्य महाभारत के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत पांडव भीम ने की थी। सभी पांडव, उनकी अर्धांगिनी द्रौपदी अथवा माँ कुंती हमेशा से एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से किया करते थे। परन्तु बलशाली भीम खाने से बेहद प्यार करते थे और चाह कर भी अपना व्रत पूरा नहीं कर पाते थे। एक दिन, जब गुरु व्यास पधारे, तब पांडव भीम ने उन्हें सब बताया और गुरु व्यास ने भीम को निर्जला एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि ये व्रत वर्ष के सभी एकादशियो का पुण्य प्राप्त कराता है। पाण्डु पुत्र भीम ने गुरु व्यास की आज्ञा का पालन करते हुए पूरी निष्ठा से निर्जला एकादशी का व्रत किया – जिसके कारण वे बेहोश भी हो गए। तब गंगा जल एवं तुलसी की पत्तिया खिला कर उनका व्रत पूरा किया गया और तभी से इस व्रत का नाम भीमसेनी एकादशी भी पड़ गया |

निर्जला एकादशी के शुभ अवसर पर सभी भक्तगण सच्चे मन एवं पूरी निष्ठा, बिना अन्न जल ग्रहण किये, उपवास करते हैं। इस दिन मंदिरो में जागरण का आयोजन भी किया जाता है अथवा द्वादशी को सूर्यौदय के उपरांत फल, मीठा और पानी पी कर इस व्रत को पूरा किया जाता है। इस व्रत को जो भक्तगण पूरी निष्ठा से पूरा करते हैं, उन पर भगवान विष्णु की अपार कृपा बरसती है।    

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