जानिए क्यों मनाते है धनतेरस और क्यों जलाते है यम के नाम का दीपक?

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भारत देश में धनतेरस एक महत्वपूर्ण त्यौहार माना जाता है। यह दिवाली से दो दिन पहले पढता है और इस दिन देवी लक्समी की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। ऐसा मन जाता है की इस दिन जो कोई भी मन से पूजा करेगा उसकी ज़िन्दगी में खुशाली आएगी।

दीपावली का त्यौहार 5 दिनों का त्यौहार होता है, जो की धनतेरस से शुरू हो कर भाई दूज पर खत्म होता है। हर वर्ष पंचांग के अनुसार कार्तिक महोने की कृष्णा पक्ष त्रयोदशी के दिन धनवंतरि त्रयोदशी मनाई जाती हैं। यह दिन मूल रूप से आयुर्वेद के जनक माने जाने ले धनवंतरी का पर्व है। आइये जानते है की क्यों और कबसे मनाया जाता है धनतेरस।

इस दिन नए बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परंपरा है। बर्तन खरीदने की शुरूआत कब और कैसे हुई, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन माना जाता है कि जन्म के समय धनवंतरी के हाथों में अमृत कलश था। यही कारण होगा कि लोग इस दिन बर्तन खरीदना शुभ मानते हैं।

पौराणिक कथाओं में धनवंतरि के जन्म का वर्णन करते हुए बताया गया है कि देवताओं और असुरों के समुद्र मंथन से धनवंतरि का जन्म हुआ था। वह अपने हाथों में अमृत कलश लिए प्रकट हुए थे। इस कारण उनका नाम पीयूषपाणि धनवंतरि विख्यात हुआ। धनवंतरि को विष्णु का अवतार भी माना जाता है।

पौराणिक कथा

पुराने समय में एक हिम नाम के राजा हुआ करते थे। उन्होंने अपने पुत्र का नाम सुकुमार रखा और राजपुरोहित से अपने पुत्र की जन्म कुंडली बनवाई। कुंडली बनाने की उपरान्त राजपुरोहित कुछ चिंतित दिखाई पड़े। राजा के पूछने पर उन्होंने कहा की “महाराज लगता है कुंडली बनाते समय मुझसे कुछ गलती हुई है, जिसके कारण मुझे भविष्य में दुर्घटना दिखाई पढ़ रही है।

राजा ने इस बात का उत्तर देते हुए कहा “राजपुरोहित जी! हमे आपकी बनाई कुंडली पर पूरा भरोसा है, आप कृपया बताये की बात क्या है?

राजपुरोहित ने कहा- महाराज , राजकुमार अपने विवाह के उपरांत चौथे ही दिन सर्प के काटने से मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे।

इस बात से राजा तिलमिलाते हुए बोले – “ये आप क्या कह रहे है ? आपसे ज़रूर कोई गलती हुई है, एक बार दुबारा कुंडली को देखे। राजा ने गुस्से में यह भी बोलै की अगर आप हमारे राजपुरोहित न होते तो आप मृत्युशैल पर लेते होते।

राजा का ऐसा गुस्सा देख कर पुरोहित ने हिम्मत करते हुए कहा- क्षमा करें राजन. किन्तु आपको अगर कोई शंका है तो आप मेरे द्वारा किये गए सुझाव पर अमल कर सकते है।

इसके बाद राजा ने अपने पुत्र की जन्मकुंडली बाकी ज्योतिष्यो से बनवाई, परन्तु परिणाम अचे नहीं निकले। राजा चिंता में रहने लगे। समय बीता और उनका पुत्र विवाह योग्य हो गया, आस पास के कई राज्यों से राजकुमार के किये विवहा प्रस्ताव आने लगे। किन्तु मित्रो के भय से राजा किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर रहे थे। यह देख कर महारानी ने राजा से कहा की हम कुंडली के डर से अपने पुत्र को कुंवारा नहीं रख सकते, क्यों न हम महल में सुरक्षा बढ़ा देऊन तो कदाचित सर्प के राजकुमार के पास पहुँचाने से पूर्व ही हम उस सर्प को मार गिराएं। राजा हिम को महारानी का सुझाव पसंद आया और उन्होंने एक सुन्दर राजकुमारी से जिसका नाम नयना था.

विवाह से पूर्व राजा ने अपने पुत्र की जन्म-कुंडली में निहित भविष्यवाणी को कन्या पक्ष को भी बता दिया। जब यह बात राजकुमारी नयना को पता चली तो उन्होंने अपने पिता से निवेदन किया की आप विवाह के लिए अपनी मंजूरी दे दें। अपनी पुत्री की बात को राजा ठुकरा न सके और विवाह के लिए आशंकित मन से विवाह के लिए हामी दे दी। विवाह अच्छे से सम्पन हुआ।

राजकुमारी नयना ने अपने पति के प्राणों की रक्षा करने का निश्चय कर लिया था। जैसे-कैसे तीन दिन बीत गए। राजा हिम और राजकुमारी नयना ने चौथे दिन का इंतजार पूरी तैयारी के साथ किया। पुरे महल को रात-भर के लिए रोशनी से जगमगाया गया ताकि सांप को आते हुए आसानी से देखा जा सके।] राजकुमारी नयना ने सुकुमार को भी सोने नहीं दिया और निवेदन किया की आज हम कहानी सुनना चाहते हैं।

मृत्यु का समय निकट आने लगा और मृत्यु के देवता यमराज पृथ्वी की ओर प्रस्थान करने लगे। क्योंकि सुकुमार की मृत्यु का कारण सर्प दंश था इसलिए यमराज ने सांप का रूप धारण किया और महल के भीतर राजकुमार सुकुमार और राजकुमारी नयना के कक्ष में प्रवेश करने का प्रयास किया। जैसे ही वह सांप के वेश कक्ष में दाखिल हुए तो हीरे-जवाहरातों की चमक से उनकी आँखे चौंधियां गई। जिस वजह से सांप को प्रवेश के लिए कोई अन्य मार्ग खोजना पड़ा।

जब वहाँ से कक्ष में दाखिल होना चाहा तो सोने और चांदी के सिक्कों पर रेंगते हुए सिक्कों का शोर होने लगा। जिससे राजकुमारी नयना चौकस हो गईं। अब राजकुमारी नयना ने अपने हाथ में एक तलवार भी पकड़ ली और राजकुमार को कहानी सुनाते रहने को कहा। डसने का मौका ना मिलता देख सांप बने यमराज को एक ही स्थान पर कुंडली मर कर बैठना पड़ा। क्योंकि अब यदि वह थोड़ा-सा भी हिलते तो सिक्को की आवाज से नयना को ज्ञात हो जाता की सर्प कहाँ है और वह उसे तलवार से मार डालती।

राजकुमार सुकुमार ने पहले एक कहानी सुनाई, फिर दूसरी कहानी सुनाई और इस प्रकार सुनाते-सुनाते कब सूर्यदेव ने पृथ्वी पर दस्तक दे दी पता ही नहीं चला अर्थात अब सुबह हो चुकी थी। क्योंकि अब मृत्यु का समय जा चूका था यमदेव राजकुमार सुकुमार के प्राण नहीं हर सकते थे, अतः वे वापस यमलोक चले गए। और इस प्रकार राजकुमारी नयना ने भविष्यवाणी को निष्फल करते हुए अपने पति के प्राणों की रक्षा की।

माना जाता है कि तभी से लोग घर की सुख-समृद्धि के लिए धनतेरस के दिन अपने घर के बाहर यम के नाम का दीया निकालते हैं ताकि यम उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचाए।

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